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अखिल भारतीय साहित्य साधक मंच - मासिक समाचार पत्र

March 2014        



शब्द -नि:शब्द

ब्रम्‍हांड अनंत ऊर्जा का असीम भण्डार है । ब"ह्माण्ड को संचालित करने के लिए इसमें निहित ऊर्जा अनेक रूपों में विकसित और परिवर्तित होती रहती है। ऐसी ही ऊर्जा का एक रूप ध्वनि भी है । ध्वनि का संचालन वायु के माध्यम से होता है जो तरंगित होकर ध्वनि के आचरण और क्षमता को प्रक्षेपित करती है । यह सर्वविदित है कि वायु पृथ्वी पर उपस्थित जीव-तत्व का एक महत्वपूर्ण अंग है और ध्वनि उसके तरंगों का विकसित रूप। प्रकृति ने भी ध्वनि को महत्वपूर्ण मानते हुए इसके लिए जीवों में श्रवण-इन्द्रिय की उत्पत्ति करके उसके अधूरेपन को सदा के लिए पूर्ण बना दिया। ध्वनि के व्यवस्थित रूप को "शब्द' कहते हैं जो अंतर्मन की अनुभूतियों के संवाहक होने के साथ-साथ सॉंसों के विस्तार और आकार के अनुवाद की भाषा भी है। शब्दों की अपनी प्रकृति,व्यवहार और गरिमा होने के साथ-साथ इनके आचरण की अपनी परिधि भी होती है जिसका निर्धारण इनके व्यवहार और प्रभाव के अनुरूप होता है । शब्दों के स्पर्श को महसूस करने के लिए इनकी धड़कनों को सुनना पड़ता है और इनसे संवाद भी करना पड़ता है। शब्द कभी "मॉं' बनकर कोमल और मखमली हो जाते हैं तो कभी पत्थर में ढलकर खुरदुरे। ये पिघलते हैं तो नदी बनकर बहने लगते हैं और सूखते हैं तो रेगिस्तान बनकर मीलों तक पसर जाते हैं। अपने स्वभाव का सानिध्य पाकर ये फूले नहीं समाते और अथाह स्नेह के बादल बनकर बरसने लगते है, मगर स्वभाव की प्रतिकूलता इन्हें बेचैन कर देती है और ये विद्रोह भी कर बैठते हैं। मनुष्य का जीवन भी किसी न किसी "शब्द' का पर्याय होता है । यही शब्द उसके स्वरुप का एक हिस्सा भी होता है जिसे वह अपने व्यक्तित्व के सांचे में ढालने हेतु जीवनपर्यन्त प्रयास करता है । हो सकता है सबके "शब्द' अलग हों, मगर अपने "शब्दों' के उदित होने पर उनसे फूटती रश्मियों का विन्यास उस व्यक्ति की संवेदना को आत्मा की गहराई तक झकझोर कर रख देता है । शब्दों का यही निश्छल प्रभाव मनुष्य के जीवन की अभिलाषा बनकर उसके जीने का परम ध्येय बन जाता है । मगर, मानव अपने स्वभाव के अनुसार शब्दों का दुरूपयोग भी करने से बाज नहीं आता । अपनी झूठी शान और चमक के लिए सूरज की किरणों की तरह चमकते शब्दों पर कोयले की काली परत चढ़ाकर उन्हें मनचाहे रंगों में ढालने का हठात्‌ प्रयास करता है और अपनी कमियों को शब्दों की आड़ में छुपाता रहता है। जो शब्द उसे जीवनपर्यन्त स्नेेह,दुलार और सम्मान देते हैं उन्हें ही वह अवसर मिलने पर निःशब्द कर देता है क्योंकि उसे डर रहता है, कहीं शब्दों के बीच बैठा उसके स्वार्थ का दर्पण लोगों के सामने उसका असली चेहरा न दिखा दे । "शब्द' तो राम, रहीम और कृष्ण होते हैं, इन्हें कंस बनाने का श्रेय भी मनुष्यों को ही जाता है। ऐसे लोग पहले तो सोने से बने शब्दों के चेहरे पर अपने मनचाहे अर्थों का मुखौटा लगाते हैं, फिर उसे अपने गले में लटकाकर पूरी दुनिया में इनका स्वामी होने का ढिंढोरा पीटते हैं । विद्रोह करने पर पैरों में बेड़ियां डालकर इनके होठों को भी सिल देते है । शब्द तो कभी मरते नहीं, मगर मानसिक असंतुलन के अवशेषों पर बैठे लोग अपने स्वार्थ-पूर्ति के लिए इनकी हत्या अवश्य कर देते हैं । लेकिन वे यह नहीं जानते कि यही शब्द नए कलेवर में बार-बार जन्म लेंगे और अपनी प्रतिध्वनि की मिठास अनगिनत अधरों पर बिखेर कर और भी अधिक मुखर होते रहेंगे। अगर आपको मनुष्य के गंदे विचारों, उसके अमानवीय कृत्यों को देखकर घृणा आती है तो आप क्यों नहीं यह कामना करते हैं कि अगले जनम में इंसान नहीं बल्कि एक "शब्द' बनकर पैदा हों, ऐसा "शब्द' जो मानवीय मूल्यों का संवाहक हो, जो ऊँची मीनारों से छोटे सपनो को धकेल कर खिलखिलाकर हॅंसता न हो और जिसकी आत्मा शुद्ध, नैतिक और सत्य हो । शब्द हमेशा अपने अर्थ के प्रति संवेदनशील और निष्ठावान होने के साथ साथ, समय और काल के साथ अक्षुण और अपरिवर्तित भी होते हैं, तभी तो मनुष्य की मृत्यु के बाद भी उसके "शब्द' अमर रहते हैं। राम, कृष्ण, मोहम्मद, ईसा मसीह जैसे अनेक पावन नाम, ब"ह्माण्ड में तैरते हुए ऐसे प्रकाश-पुंज हैं जो "शब्द' होकर भी सूर्य से अधिक प्रकाशवान है ! इनके नाम से सुवासित शब्दों की आहट भर से सर श्रद्धा से झुक जाता है। इनके नाम से अभिमंत्रित ये "शब्द' हमारे विचारों में असीम ऊर्जा और अथाह प्रेरणा भरने के अलावा आदर्श की नई ज्योति भी प्रज्वलित करते हैं जो हमें जीवन के नये क्षितिज का अविषेक करने की दिशा में अग"सर होने को जीवनपर्यन्त प्रेरित करती रहती है। लेकिन "शब्द' बनना इतना आसान भी नहीं । मनुष्य से "शब्द' बनने की प्रकि"या में पहले "स्वयं' को त्यागकर "इंसान' बनना पड़ता है फिर एक ही जीवन में बार-बार मरकर अपनी शुद्धता की पूर्णता को परखना पड़ता है और तब फिर से जन्म लेकर सच और समर्पण की आग में तप-तप कर अपने अंदर का "सोना' सूरज की तेज आंच के हवाले करना पड़ता है और सुनिश्चित करना पड़ता है कि वह पिघल कर अनवरत बहने वाली नदी बन जाय, इतनी बहाव वाली नदी जो मनुष्य के "गूंगेपन' को अपनी तेज धार में बहाकर इतनी दूर फेक सके जहॉं से वह कभी वापस न आ सके। सच है ! इंसान, जो शब्दों की अस्मिता के साथ खेलते हैं, उनसे तो बेहतर है कोई शब्द बन कर या किसी शब्द की पहचान बन कर जीना या फिर किसी नए शब्द में ढलकर अपनी पहचान को एक ऐसी संज्ञा की परिभाषा बना देना जिसकी कोख से फिर किसी गंगा के अवतरित होने की प्रबल सम्भावना बनती हो, क्योंकि जब भी गंगा धरती पर उतरती है तो एक नए युग के सृजन के साथ कोई "भगीरथ' भी युगों के उस छोर तक लोगों की आत्मा में बहता रहता है जहॉं तक गंगा की धारा का बहाव जाता है। सच कहें तो यही जीवन का ध्येय भी है। अंत में इतना ही कहना चाहूंगा कि अगर "शब्द' बनना कठिन लगता है तो कम से कम किसी "शब्द' को नि:शब्द होने से बचाकर "शब्द' बनने की दिशा में पहला कदम तो उठा ही सकते हैं ।

-ज्ञानचंद मर्मज्ञ




"प्रेम प्रदर्शन'

एक वो ज़माना था जब वसंत के आगमन पर कवि कहते थे,
अपनेहि पेम तरुअर बाढ़ल,कारण किछु नहि भेला ।
साखा प"व कुसुमे बेआपल,सौरभ दह दिस गेला।। (विद्यापति)
आज तो न जाने कौन-कौन-सा दिन मनाते हैं और प्रेम के प्रदर्शन के लिए सड़क-बाज़ार में उतर आते हैं। इस दिखावे को प्रेम-प्रदर्शन कहते हैं। हमें तो रहीम का दोहा याद आता है,
रहिमन प्रीति न कीजिए, जस खीरा ने कीन।
ऊपर से तो दिल मिला, भीतर फांके तीन
खैर, खून, खांसी, खुशी, बैर, प्रीति, मद-पान।
रहिमन दाबे ना दबत जान सकल जहान
हम तो विद्यार्थी जीवन के बाद सीधे दाम्पत्य जीवन में बंध गए इसलिए प्रेमचंद के इस वाक्य को पूर्ण समर्थन देते हैं, जिसे सच्चा प्रेम कह सकते हैं, केवल एक बंधन में बंध जाने के बाद ही पैदा हो सकता है। इसके पहले जो प्रेम होता है, वह तो रूप की आसक्ति मात्र है --- जिसका कोई टिकाव नहीं।
उस दिन सुबह-सुबह नींद खुली, बिस्तर से उठने जा ही रहा था कि श्रीमती जी का मनुहार वाला स्वर सुनाई दिया, कुछ देर और लेटे रहो ना।
जब नींद खुल ही गई थी और मैं बिस्तर से उठने का मन बना ही चुका था, तो मैंने अपने इरादे को तर्क देते हुए कहा, नहीं-नहीं, सुबह-सुबह उठना ही चाहिए।
क्यों? ऐसा कौन-सा तीर मार लोगे तुम?
मैंने अपने तर्क को वजन दिया, इससे शरीर दुरुस्त और दिमाग़ चुस्त रहता है।
अब उनका स्वर अपनी मधुरता खो रहा था, अगर सुबह-सुबह उठने से दिमाग़ चुस्त-दुरुस्त रहता है, तो सबसे ज़्यादा दिमाग का मालिक दूधवाले और पेपर वाले को होना चाहिए।
तुम्हारी इन दलीलों का मेरे पास जवाब नहीं है। कहता हुआ मैं गुसलखाने में घुस गया। बाहर आया तो देखा श्रीमती जी चाय लेकर हाज़िर हैं। मैंने कप लिया और चुस्की लगाते ही बोला, अरे इसमें मिठास कम है ..!
श्रीमती जी मचलीं, तो अपनी उंगली डुबा देती हूं .. हो जाएगी मीठी।
मैंने कहा, ये आज तुम्हें हो क्या गया है?
तुम तो कुछ समझते ही नहीं कितने नीरस हो गए हो? उनके मंतव्य को न समझते हुए मैं अखबार में डूब गया।
मैं आज जिधर जाता श्रीमती जी उधर हाज़िर .. मेरे नहाने का पानी गर्म, स्नान के बाद सारे कपड़े यथा स्थान, यहां तक कि जूते भी लेकर हाजिर। मेरे ऑफिस जाने के वक़्त तो मेरा सब काम यंत्रवत होता है। सो फटाफट तैयार होता गया और श्रीमती जी अपना प्रेम हर चीज़ में उड़ेलती गईं।
मुझे कुछ अटपटा-सा लग रहा था। अत्यधिक प्रेम अनिष्ट की आशंका व्यक्त करता है।
जब दफ़्तर जाने लगा, तो श्रीमती जी ने शिकायत की, अभी तक आपने विश नहीं किया।
मैंने पूछा, किस बात की?
बोलीं, अरे वाह! आपको यह भी याद नहीं कि आज वेलेंटाइन डे है!
ओह! मुझे तो ध्यान भी नहीं था कि आज यह दिन है। मैं टाल कर निकल जाने के इरादे से आगे बढ़ा, तो वो सामने आ गईं। मानों रास्ता ही छेक लिया हो। मैंने कहा, यह क्या बचपना है?
उन्होंने तो मानों ठान ही लिया था, आज का दिन ही है, छेड़-छाड़ का ...
मैंने कहा, अरे तुमने सुना नहीं टामस हार्डी का यह कथन र्ङेींश ळी श्रराश रीं षळषींू ूशरीी !
यह तो बच्चों के लिए है, हम तो अब बड़े-बूढ़े हुए। इस डे को सेलेब्रेट करने से अधिक कई ज़रूरी काम हैं, कई ज़रूरी समस्याओं को सुलझाना है। ये सब करने की हमारी उमर अब गई।
यह तो एक हक़ीक़त है। ज़िन्दगी की उलझनें शरारतों को कम कर देती हैं। ... और लोग समझते हैं ... कि हम बड़े-बूढ़े हो गए हैं।
बहुत कुछ सीख गई हो तुम तो..।
वो अपनी ही धुन में कहती चली गईं,
न हम कुछ हंस के सीखे हैं,
न हम कुछ रो के सीखे है।
जो कुछ थोड़ा सा सीखे हैं,
तुम्हारे हो के सीखे हैं।
मैंने अपनी झेंप मिटाने के लिए विषय बदला, पर तुम्हारी शरारतें तो अभी-भी उतनी ही अधिक हैं जितनी पहले हुआ करती थीं ...
उनका जवाब तैयार था, हमने अपने को उलझनों से दूर रखा है।
उनकी वाचालता देख मैं श्रीमती जी के चेहरे की तरफ़ बस देखता रह गया। मेरी आंखों में छा रही नमी को वो पकड़ न लें, ... मैंने चेहरे को और भी सीरियस कर लिया। चेहरे को घुमाया और कहा, तुम ये अपना बचपना, अपनी शरारतें बचाए रखना, ... ये बेशक़ीमती हैं!
अपनी तमाम सकुचाहट को दूर करते हुए बोला, लव यू!
और झट से लपका लिफ़्ट की तरफ़।
शाम को जब दफ़्तर से वापस आया, तो वे अपनी खोज-बीन करती निगाहों से मेरा निरीक्षण सर से पांव तक करते हुए बोली, लो, तुम तो खाली हाथ चले आए
क्यों, कुछ लाना था क्या?
बोलीं, हम तो समझे कोई गिफ़्ट लेकर आओगे।
मन ने उफ़्फ़ ... किया, मुंह से निकला, गिफ़्ट की क्या ज़रूरत है? हम हैं, हमारा प्रेम है। जब जीवन में हर परिस्थिति का सामना करना ही है तो प्रेम से क्यों न करें?
लेकिन वो तो अटल थीं, गिफ़्ट पर। अरे आज के दिन तो बिना गिफ़्ट के नहीं आना चाहिए था तुम्हें, इससे प्यार बढ़ता है।
मैंने कहा, गिफ़्ट में कौन-सा प्रेम रखा है? ... अपनी जेब का "याल मन में था और ज़ुबान पर, जो प्रेम किसी को क्षति पहुंचाए वह प्रेम है ही नहीं। मैंने अपनी बात को और मज़बूती प्रदान करने के लिए जोड़ा, टामस ए केम्पिस ने कहा है - अ ुळीश र्श्रेींशी र्ींरर्श्रीशी पेीं ीे र्ाीलह ींहश सळषीं ेष ींहश र्श्रेींशी री ींहश र्श्रेींश ेष ींहश सर्ळींशी.
और मैं समझता हूं कि तुम बुद्धिमान तो हो ही।
उनके चेहरे के भाव बता रहे थे कि आज ... यानी प्रेम दिवस पर उनके प्रेम कभी भी बरस पड़ेंगे। मेरा बार बार का एक ही राग अलापना शायद उनको पसंद नहीं आया। सच ही है, जीवन कोई म्यूज़िक प्लेयर थोड़े है कि आप अपना पसंदीदा गीत का कैसेट बजा लें और सुनें। दूसरों को सुनाएं। यह तो रेडियो की तरह है --- आपको प्रत्येक फ"ीक्वेंसी के अनुरूप स्वयं को एडजस्ट करना पड़ता है। तभी आप इसके मधुर बोलों को एन्ज्वाय कर पाएंगे।
मैंने सोचा मना लेने में हर्ज़ क्या है? अपने साहस को संचित करता हुआ रुष्टा की तरफ़ बढ़ा।
हे प्रिये!
क्या है ..(नाथ) ..?
(हे रुष्टा!) क्रोध छोड़ दे।
गुस्सा कर के मैं कर ही क्या लूंगी?
मुझे अपसेट (खिन्न) तो किया ही ना ...
हां-हां सारा दोष तो मुझमें ही है।
चेहरे से लग तो रहा है कि अब बस बरसने ही वाली हो।
तुम पर बरसने वाली मैं होती ही कौन हूं?
मेरी प्रिया हो, मेरी .. (वेलेंटाइन) ...
वही तो नहीं हूं, इसीलिए ...
(अपनी क़िस्मत को कोस रही हूं) ...
"खबरदार! ऐसा कभी न कहना!!"
"क्यों कहूंगी भला! मुझे मेरा गिफ्ट मिल जो गया.
सब कुछ खुदा से मांग लिया तुमको मांगकर!'
"........................"
***
हमारे जीवन में हमारा प्रेम-प्रदर्शन इसी तरह होता आया है।
इस पथ का उद्देश्य नहीं है श्रांति भवन में टिक रहना
किन्तु पहुंचना उस सीमा पर जिसके आगे राह नहीं
अथवा उस आनन्द भूमि में जिसकी सीमा कहीं नहीं। (जयशंकर प्रसाद)


मनोज कुमार,कोलकाता




होली के बहुरंग

आया मधुमास।
हिमगात हेमंत की मार से नीलवर्ण आकाश को मिला उजास।
शीत की श्वेतिमा में मिले केसर के रंग। फूले कुसुम।
गदराया सरसों।
बौराये रसाल से झहरे मकरंद। सुगंध महुआ का मादक... पुनर्नवा हुई प्रकृति।
लौट आया वसुंधरा का यौवन।
फूटे कोयल की कूक। पपीहे की हूक। अमराई में भौंरों का गुंजार। सरसों के मुकुलित आंचल में गौरैयों की अठखेलियां.... अरुण प्रसून संभाले सेमल की फुनगी पे सुग्गों की टें-टें... सांझ-भिनसार बांस के बीट में विहग-वृंद का कलरव.... टी-बी-टी-टुट-टुट। शरद के साहचर्य से सकुचाई धरा के बहुरे दिन। किसलय की कोमलता, काकली के गीत का माधुर्य, पुष्पों से ले पराग, ओढ़ धानी चुनर वसुधा ऋतुराज से मिलन को इतराई। मनचली बसंती हवा हरजाई.... बन अनंग के वाण। अतृप्त प्राण। आकुल आत्मा ढूंढे प्रणय के संगीत। फ़ागुन के गीत..... पिया संग खेलो होरी...फ़ागुन आयो री...! स्वर्णिम धरा। रक्ताभ गगन। कभी मंद कभी झकझोर। पवन का हिलोर। झुमती अलसी। झांझ बजाती गेहुँ की स्वर्णाभ बालियॉं। खेत के मेड़ों पे फ़ागुनी गाये कृषक-कन्याएं पिया ला दे कुसुम रंग साड़ी झमाझम पानी भरूँ। झुक गया अरहर का तन। खिल उठे किसानों के मन। हर गली बरसाना। हर गांव वृंदावन। हर ताल सरयू। हर तलैय्या यमुना-तट। पनिहारिन गोपियां। सर पे गगरी। कैसे खेलें होरी। कृष्ण करे बलजोरी, फ़ाग में न मानिहौं बात तोरी एक भी ! चुनरी रंगा ले गोरी, होरी साल भर पे आई है! अह्ह्हा... सकल मनोरथ पुरे उनके, जिन देखा यह दृश्य। कालिंदी-कूल। कदंब की डार। मुरलीधर मुकुंद। टेरे राग धमार। अनुनय करे ब"जनारी। ना माने गिरिधारी। ऐसी मारी पिचकारी... भींगी अंगिया-साड़ी। गोपियां बेचारी। कान्हा की बलिहारी। अब तो जल लेने दो मुरारी। ऐ बंदवारी.... ! भरने दे हो गागर बंदवारी.... भरने दे !
भरने दे हो गागर बंदवारी..... भरने दे !!
लाज है औरत की साड़ी लोग बोलें कुछ हम नहीं !
ऐ मेरे ब"जराज मोहन, है तुझे कुछ गम नहीं !!
लहंगा-साड़ी लाज हमारी....
मत मारो रंग पिचकारी.......
हो-हो मत मारो रंग पिचकारी.... भरने दे.... !
भरने दे हो गागर बंदवारी.... भरने दे !!
हूँ भला मानुस सदा, होशियार और बुद्धियार हूँ !
जानता हूँ सब मगर इस फाग भर लाचार हूँ !!
नंद-छैल जग में जस तेरो.....
हो फैल रही है है उजियारी........
हो-हो फैल रही है उजियारी.... भरने दे... !
भरने दे हो गागर बंदवारी.... भरने दे !!
जानकर अनजान पनघट पर हो बनते क्यों लला ?
द्रौपदी की लाज रखी थी, बताओ क्यों भला ??
बात तेरी सत्य है ब"जनायिका सुन तो सही !
द्रौपदी की लाज रखी थी, मगर फ़ागुन नहीं !!
हॉं-हॉं करत रंग डारे मुरारी.....
भीजि गयी पटुकी-साड़ी......
हो-हो भीजि गये पटुकी-साड़ी.... भरने दे !
भरने दे हो गागर बंदवारी.... भरने दे !!
ऐ कन्हैया बेवफ़ा अब छोड़ दे बकवादियॉं !
देख लेंगे लोग सब, होगी नगर बदनामियॉं !!
सासु-ननद घर खोजत होइहैं....
देर भए तो दिये गारी......
हो-हो देर भए तो दिये गारी...... भरने दे !
भरने दे हो गागर बंदवारी.... भरने दे.... !!
इस प्रकार गोपियों की गारी, मोहन की बटमारी, ़ फागुन की खुमारी... या पै सबै धन वारी...! आज भी सुने जाते हैं होली खेलय नंदलाल बृज में और अवध में होली खेले रघुवीरा।
चौपाल पे फ़ागुन आयो... मस्ती लायो.... जोगीजी धीरे-धीरे....! रंग बरसे...! हिय हरसे.... सदा आनन्द रहे आपके द्वारे....
रंगोत्सव की सरस शुभ-कामनाएं !


केशव कर्ण, बेंगलूरू

मनोज कुमार,कोलकाता




संक्षिप्त समाचार

ज्ञानचंद "मर्मज्ञ'की कविता पाठ्‌यक"म में शामिल जाने माने ओज कवि एवं गीतकार ज्ञानचंद मर्मज्ञ की चर्चित कविता "आओ बात करें बस हिंदुस्तान की' को सी.एम.आर इंस्टिट्यूट आफ मैनेजमेंट स्टडीस ( स्वायत्त ) बेंगलूरू द्वारा बी.बी. एम/ बी. काम./ बी एस सी / बी सी ए के हिंदी -पाठ्यक"म में शामिल किया गया है। "काव्य-धारा' नामक इस पुस्तक के संपादक डॉ. आनंदप्पा ईरमुखदवर हैं। डॉ. नीलू गुप्ता की कविता पुरस्कृत "विश्व हिन्दी ज्योति' अमेरिका की अध्यक्ष डॉ. श्रीमती नीलू गुप्ता की कविता "यहॉं और वहॉं' को विश्व हिन्दी सचिवालय मॉरीशस द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय कविता प्रतियोगिता के अंतर्गत अमेरिका भौगोलिक क्षेत्र में द्वितीय पुरस्कार मिला है। डॉ. नीलू गुप्ता विगत कई वर्षों से अमेरिका के कैलिफोर्निया में हिन्दी अध्यापन के साथ ही साथ भारतीय संस्कृति एवं हिन्दी के विकास के लिए सतत्‌ प्रयत्नशील हैं। अखिल भारतीय साहित्य साधक मंच की ओर से डॉ. नीलू गुप्ता को इस उपलब्धि पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।



अभिमत

आदरणीय संपादक जी,

साहित्य साधक मंच का फरवरी-2014 अंक मिला, पढ़कर बड़ा आनन्द आया। श्री ज्ञानचंद "मर्मज्ञ' जी ने अपने अमेरिका प्रवास का बड़ा ही सजीव चित्रण किया है। कुछ पलों के लिए लगा कि जैसे मैं स्वयं अमेरिका के किसी शहर की गली में खड़ा हूँ और कृत्रिम मुस्कराहट लिए मशीनी लोग आँखों के सामने से गुजरते चले जा रहे हैं। वास्तव में आज का युग अवसरवादिता, उपभोक्तावाद तथा विकृत अर्थवाद, जिसका उद्‌देश्य केवल "लूट' है, के भंवर तंत्र में बुरी तरह जकड़ चुका है। इसी वजह से जीता जागता इंसान केवल लाभ कमाने का जरिया बन गया है और इसके फलस्वरूप इंसान के अंदर एक "तड़प' छटपटा रही जो उसे कृत्रिमता से पगी मुस्कराहट अपने चेहरे पर ओढ़े रहने के लिए विवश कर रही है। "मर्मज्ञ' जी के इस हृदयस्पर्शी वर्णन से प्रेरित होकर कुछ पंक्तियॉं भी मेरी कलम से निर्झर की तरह फूट पड़ी हैं :

चरम की अनुभूति अद्‌भुत आत्मिक आह्लाद है
मुस्कराहट हार्दिक आनंद का अनुवाद है
मन में अपनेपन की जब मीठी महक घुल जाती है
भावना तब मुखर हो आँखों से देती दाद है
जब चरम पर वेदना हो, दर्द हो मनप्रान्त में
इक हंसी सब दु:खों से मन को करे आज़ाद है
आधुनिकता, अर्थ, अवसरवादिता है कष्टप्रद
निष्कपट, नि:स्वार्थ, हर्षित वदन पर अपवाद है
खोखली खुशियॉं बढ़ातीं कृत्रिमता का दायरा
"देश' किन्तु होता हावी दिन ब दिन अवसाद है


देशपति "देश', बेंगलूरू



***


श्री मर्मज्ञ जी,

"अखिल भारतीय साहित्य साधक मंच' द्वारा प्रकाशित मासिक पत्र निरंतर प्राप्त हो रहा है। इस सद्‌कार्य के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद एवं बधाई। इस पत्र के माध्यम से हिन्दी की प्यास बुझ जाती है। मंच की ओर से हर महीने आयोजित होने वाली काव्य गोष्ठी का अनियमित श्रोता रहा हूँ। लेकिन यह पत्र स्वाति नक्षत्र की बूँद का काम कर रहा है। आपका लेख "हिन्दी का वनवास' तथा "प्रकृति' अत्यंत सराहनीय है।

डॉ. नित्यानंद झा, सहायक निदेशक-गीत और नाटक प्रभाग,सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, केन्द्रीय सदन, बेंगलूरू।



***


श्री ज्ञानचंद जी,

साहित्य साधक मंच का मासिक पत्र अहिन्दी भाषी क्षेत्र में निरन्तर हिन्दी की आभा प्रसारित कर रहा है। यह पत्र "गागर में सागर' की उक्ति को चरितार्थ करता है। रचनाओं का चयन व प्रकाशन निष्पक्ष व निर्भीक भाव से संबलित है। पत्र के प्रकाशन एवं सम्पादन हेतु लब्ध प्रतिष्ठित विद्वान कवि श्री ज्ञानचंद "मर्मज्ञ' बधाई के पात्र हैं।

>कृष्णमणि चतुर्वेदी, अध्यक्ष-सरिता लोकभारती संस्थान, सुल्तानपुर, उ.प्र.।





पता पूछते हैं लोग

पानी में मछलियों का पता पूछते हैं लोग,
आंसू से सिसकियों का पता पूछते हैं लोग।
बारूद के ईमान पर इतना है भरोसा,
माचिस की तीलियों का पता पूछते हैं लोग।
अक्सर चमन में शाख़ से फूलों को तोड़कर,
बेदर्द आंधियों का पता पूछते हैं लोग।
पढ़ते हैं महज़ ख़ून के रंगों की कहानी,
आदत है सुर्ख़ियों का पता पूछते हैं लोग।
चिनगारियों की राख सम्भाली नहीं गयी,
शोलों और बिजलियों का पता पूछते हैं लोग।
फूलों ने जब से छोड़ा खिलना बहार में,
पत्थर से तितलियों का पता पूछते हैं लोग।
उनके घरों से देखकर उठता हुआ धुआं,
विश्वास के दीयों का पता पूछते हैं लोग।
जंगल में राम भेजकर सीता को जलाकर,
मन्दिर की सीढ़ियों का पता पूछते हैं लोग।


ज्ञानचन्द "मर्मज्ञ', बेंगलूरू





ग़ज़ल

किया करता तो है वादे वो अक्सर तोड़ देता है..
घरौंदे रोज़ सपनों के सितमगर तोड़ देता है..
कहॉं मजदूर में ताक़त जो लड़ पाये चट्टानों से..
ये जज़्बा भूख से लड़ने का पत्थड़ तोड़ देता है..
भरत जैसे सभी भाई नहीं होते जमाने में..
विभीषण सा कोई भाई यहॉं घर तोड़ देता है..
जलायेंगे मिल-जुल के दीपक हम दिवाली के..
यही उम्मीद तो दंगों का मंजर तोड़ देता है..
परिंदे हम जहाजों के कहॉं जायें किधर जायें..
उड़ानों के अज़ाईम को समंदर तोड़ देता है..
वो पानी भरने जाती थी अगरचे जानती भी थी..
नदी पर है कोइ बैठा जो गागर तोड़ देता है..
"हयात" ऐसा भी होता है मुक़द्दर गर न साथी हो..
कोई मोती को भी पत्थड़ समझ कर तोड़ देता है..


-शमीम हयात, बेंगलूरू





ग़ज़ल

जो टहनियों पे फुदकता है आमरण मित्रो।
वो तितलियों को सिखाता है व्याकरण मित्रो।
स्वयं है श्यामवर्ण गुनगुना रहा है सतत,
स्वार्थ की नीति बनाता है आचरण मित्रो।
तेरा बहिरंग-अंतरंग सभी समरस है,
पुष्प-कलिका को सिखाता है तू रमण मित्रो।।
प्रेम का हेतु प्रेम वासना अपावन है,
प्रेम में त्याग और दान है प्रतिक्षण मित्रो।
मनुज की रीति-नीति अन्य योनि से न्यारी,
बैठ सकता नहीं कभी समीकरण मित्रो।।
भटक चुका है जीव विविध योनि में अब तक,
अन्त की योनि मनुज भोगता क्षण-क्षण मित्रो।
"मृदुल' उपकार करें, भूल चलें अपना दु:ख,
संग परमात्ममय संसार विलक्षण मित्रो।।


-मृदुलमोहन अवधिया,जबलपुर (म.प्र.)







तेरी याद सताए
खिले धूप, यदि छटे कुहासा
फिर बगिया लहराए,
देखें जब हरियाली अंखियॉं
रूप तेरा मन आये,
सरदी के इस मौसम में अब
तेरी याद सताए।
होठों पर हैं कम्पन,
लेकिन गीतों के बोल नहीं,
घना कुहासा, व्याकुल मन है
व्याकुलता अनमोल नहीं?
किरणों-की मुस्कान तिहारी
उसको धुंध छिपाए,
सरदी के इस मौसम में अब
तेरी याद सताए।
घने धुन्ध में रूप तुम्हारा
सिमट-सिमट कर आया,
जिसे देख भारी होता मन
थोड़ा सा शरमाया।
सुरभि तुम्हारी तिरे चतुर्दिक्
पवन उसे बतलाए,
सरदी के इस मौसम में अब
तेरी याद सताए।
द्वारे सजी रंगोली रह-रह
मुझ से करे ठिठोली,
बूंद ओस की झूल रही है,
पाती-पाती डोली।
मधुर मिलन की मनोकामना
मन ही मन इठलाए,
सरदी के इस मौसम में अब
तेरी याद सताए।
सूरज को तो गहन लगा है
दिल में बढा अंधेरा,
दोपहरी में मध्य निशा ने
डाल रखा है डेरा ।
तेरा रूप रोशनी मॉंगे
झलक जो तू दिखाए,
सरदी के इस मौसम में अब
तेरी याद सताए।


- मनोज कुमार, कोलकाता





बाल मजदूर

समाज में नौनिहालों के लिए
नारें होते हैं,
क्योंकि वे सबकी आंखों के
तारे होते हैं।
कमा कर लाते हैं वे
उम" से अधिक,
इसीलिए वे घरवालों को
प्यारे होते हैं।
खेत-खलिहान हों
उद्योग या उद्यान,
शोषण के शिकार बाल मजदूर
सारे होते हैं।
जोखिम उठाते हैं, नहीं चैन
पाते वे,
कच्ची उम" में जीवन से
हारे होते हैं।
खेलने की उम" में बोझ
ढोते काम का,
और बच्चों से बाल मजदूर
न्यारे होते हैं।
मेहनत के बाद भी पाते हैं
बहुत कम,
तभी तो अभावों के वे सदा
मारे होते हैं।
- डॉ. राकेश अग"वाल, हापुड़ (उ.प्र.)
हौसला
कली, हवा के झोंकों से,
मधुप-संगीत-लय पर,
प्रणय के झूले झूलती है,
तो फूल बन जाती है,
दुर्भाग्य ! फॅंस जाय जो अंधड़ में,
थपेड़े रौंद देते हैं,
कॉंटे छेद देते हैं-पंखुड़ियॉं,
कली, खिल भी नहीं पाती,
पैरों की धूल बन जाती है,
फूल ! इतरा नहीं- इठला नहीं,
महक-मिस कामी भौंरे,
गूँजेंगे-मर मिटेंगे-जान देंगे,
खींचकर-छेद देंगें-नोच देंगे,
न पंखुड़ियॉं ही बचेंगी, ना धूल ही बाकी
धूल ! ग़म न कर,
पैरों से रौंदने वाले मिट जाएंगे,
हरियाली-आच्छादित-उपवन,
फिर नई कलियॉं खिलाएंगे,
हवा के मंद-मंद झोंके, मधुप संगीत-लय पर,
प्रणय झूले झुलाकर, सुवासित फूल खिलाएंगे।
तूफान, झॉंकने भी न पाए उपवन में,
जागते रहना ओ माली !
पड़ोसी ने तूफान बुलाया है,
टूटे नगाड़ों को- फूटी नौबत को,
मतलबी मढ़वैयों से, फिर से मढ़वाया है।

-अशोक उपाध्याय, बेंगलूरू





सत रंगों की ताल

फूलों ने दी झूमकर
सत रंगों की ताल
सरसों के मुख पर पड़ा
मादक पीत गुलाल।
शोख पत्तियों के नयन
होने लगे अधीर
संयम पर ओ पड़ने चला
फिर अनंग का जाल।
मोर्पंखिया हो गए
सपनों वाले गांव
पड़ते नहीं जमीन पर
अब इस मन के पावॅं।
एक कंकरी से हिला फिर
से मन का ताल
संयम पर पड़ने चला
फिर अनंग का जाल।
खिलते हुए गुलाब से अधर
कर रहे हड
सुर्ख नयन लेते गए
सारे गीत निचोड़।
जागा सुआ उमंग का
लेने लगा उछाल।
संयम पर पड़ने चला
फिर अनंग का जाल।


- सुशील "सरित', आगरा





किसे सुनाऊँ अपने गीत

किसे सुनाऊँ अपने गीत
तुम ही नहीं रहे मेरे प्रिय,
किसे सुनाऊं अपने गीत ?
वह मधुमय संसार सुहाना,
वह स्वर्णिम शैशव का हास !
सह-क"ीड़ा साहचर्य हमारा,
बन कर रहा शुष्क इतिहास !!
क्या ये आँख-मिंचौनी ही है,
जरा बता बचपन के मीत !
तुम ही नहीं रहे मेरे प्रिय,
किसे सुनाऊं अपने गीत ??
कौतुहल कलरव पीपल तल,
वृहत विटप के शीतल छॉंव !
तटनी-तट सिकता का आँचल,
स्नेह सुधानिधि सुन्दर गॉंव !!
पगडण्डी पर आँख बिछाए,
गए कई निशि-वाषर बीत !
तुम ही नहीं रहे मेरे प्रिय,
किसे सुनाऊं अपने गीत ??
अश्रु शेष केवल आँखों में,
सपने तक नहीं आते हैं !
उस पीड़ा को क्या जानो तुम,
जब अपने छोड़ के जाते हैं !!
याद तुम्ही को करना प्रतिपल,
मेरे जर-जीवन की रीत !
तुम ही नहीं रहे मेरे प्रिय,
किसे सुनाऊं अपने गीत ??


- केशव कर्ण, बेंगलूरू





सब खेलत रंग

खिला-खिला यह दिन होली का,
बुझी रात की तन्द्रा, प्रतिक्षण।
धरती अम्बर रंग खेलत,
अबीर, गुलाल उड़ायें हर क्षण।।
स्पन्दित, आह्लादित होता,
इस विराट का कण्वन-कण्वन।
जोश-उमंगी किरण उल्लसित,
प्रतिबिम्बित है दर्पण-दर्पण।।
अम्बर के तारे अति सुन्दर,
इन्द्रधनुषी छटा, मनोहर।
रह ना जाए कोई पीछे,
लगे दौड़ में सारे सत्वर।।
टेसू, हरसिंगार, पलाशी,
बिखर गये चूनर पर सारे।
छूता है जब पवन फागुनी,
"उर्मि', फरकत अंग हमारे।।


-उर्मिला श्रीवास्तव "उर्मि', बेंगलूरू





काव्य गोष्ठी में आज़ादी के गीतों के गूंजे तराने

"हिन्दोस्तां के हम हैं, हिन्दोस्तां हमारा'

अखिल भारतीय साहित्य साधक मंच,बेंगलोर के तत्वाधान में संस्था की 83वीं काव्य गोष्ठी और मुशायरे का आयोजन किया गया। कार्यक"म की अध्यक्षता वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री रमेश जोशी ने किया । मंच पर बतौर मु"य अतिथि गोरखपुर से पधारे गीतकार श्री जगदीश खेतान और विशेष अतिथि के रूप में बंेंगलोर के शायर श्री सुरेंदर कोहली "सूरी' मौजूद थे ।
कार्यक"म के प्रथम सत्र में "अमेरिका में हिंदी की ज्योति' विषय पर परिचर्चा हुई, जिसमें श्री ज्ञानचंद मर्मज्ञ, श्री रमेश जोशी और श्रीमती मंजू वेंकट ने अपने अनुभवों पर आधारित व्या"यान दिया। चर्चा उद्देश्य पूर्ण एवं सफल रही ।
कार्यक"म के दूसरे सत्र में आयोजित काव्य गोष्ठी व मुशायरे में कवियों एवं शायरों ने देशभक्ति से ओतप्रोत उत्कृष्ट रचनाओं का पाठ कर गोष्ठी को आज़ादी के जश्न में तब्दील कर दिया। शायर नज़ीर नुसरत ने अपनी मनमोहक आवाज़ में जब "हिन्दोस्तां के हम हैं, हिन्दोस्तां हमारा' सुनायी तो पूरा सदन तालियों की गड़गड़ाहट से भर गया । मंजू वेंकट ने व्यंग्य करते हुए आज़ादी के मायने को कुछ इस तरह बताया, "साठ पार कर गयी आज़ादी, झुकी कमरिया मुड़ गयी लाठी, गुरबत की गठरी सर पे उठाये, बीच राह में भटके हम।' वरिष्ठ कवि श्री प्रेमचन्द कोठारी ने जीवन के सत्य को अपने गीतों में कुछ इस तरह ढाला "कुछ भी न कामना है, मुझसे ही सामना है।' ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने नववर्ष की बधाई देते हुए समाज की पीड़ा को यूँ उकेरा, "हो गया ग़म पुराना नये साल में, छोड़ो सुनना सुनाना नए साल में। सूनी सड़कों पर चीखों का अम्बार है, बेटियों को बचाना नए साल में। इनके अलावा श्री भागीरथ अग"वाल, त्रिलोकीनाथ धर, डॉ. रणजीत, रमेश जोशी, रियाज़ अहमद खुमार, मंजू वेंकट, शमीम हयात, मुस्ताक अहमद शाह, जयंती खेतान, इन्दुकांत आंगिरस, संतलाल धुर्वे, चिंतन शीतल, सुरेन्द्र कोहली सूरी, त्रिपुरारी, अशोक उपाध्याय, प्रकाश उनियाल, देशपति देश, तुलसी अग"वाल, जी. आर. के. रेड्डी, रजनी शाह, पहाड़ सिंह हिलटॉप, सुनील कुमार जैन, रफत आसिफी, मुस्ताक अहमद मुस्ताक, ईश्वर चन्द्र मिश्र और जगदीश खेतान जैसे चर्चित रचनाकारों ने इस सत्र में अपनी उत्कृष्ट कविताओं, ग़ज़लों और गीतों का पाठ कर इसे अविस्मरणीय बना दिया । कार्यक"म का संचालन मंच के अध्यक्ष श्री ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने किया । काव्य गोष्ठी व मुशायरे के समापन के पश्चात सभी लोगों ने सुरुचिपूर्ण भोजन का आनंद उठाया । "कोई रंगे वफ़ा नहीं मिलता'
होली हमारा एक ऐसा पारम्परिक पर्व है, जो किसी भी तरह की वर्जना को स्वीकार नहीं करता। इस दिन जाति, धर्म, आयु और स्त्री-पुरुष की सारी कल्पित वर्जनायें अपने आप टूट जाती हैं। सब कुछ बंधन मुक्त हो उठता है। कितना बड़ा और अर्थपूर्ण संदेश है इस पर्व का। किन्तु इस पर्व के संदेश को हम अपने जीवन में कितना स्वीकार कर पाते हैं आज यह चिन्ता का विषय बन गया है। एक तरह से यह भी एक रस्म भर बन कर रह गया है और अपनी पहले की सारी अर्थवत्ता खो चुका है। आज इस पर्व के अवसर पर हमें कवि "शैदा' का एक मुक्तक याद आता है

         कोई ऐसा वरमला नहीं मिलता,
         दिल से दिल नहीं मिलता।
         क्या कहें हम भी खेलते होली ,
         लेकिन कोई रंगे-वफा नहीं मिलता।।


दिलों में जब गुबार भरा होगा, एक-दूसरे के प्रति मन में नफरत का भाव होगा, लोग अपनी झूठी शान-शौकत में इतरा रहे होंगे तो कोई रंगे वफा कहां से होगा। जिस देश की संस्कृति में पूरे विश्व को एक परिवार के रूप में देखने का संदेश दिया गया वही देश आज जातियों, धर्मों, प्रान्तों के इतने खानों में बंट गया है कि वहां एक विश्व कुटुम्ब की बात तो दूर एक छोटा-सा परिवार भी सही अर्थों में एक ईमानदार परिवार होने की भूमिका नहीं निभा पा रहा है। इसे एक विडम्बना नहीं तो और क्या कहा जाए। हमारे ऐसे कई सामाजिक नियम हैं जो हमारे समाज और परिवार की पूरी दिशा बदल सकते हैं पर उन पर कितना अमल हो पा रहा है यह हममें से किसी से छिपा नहीं है। हम इनकी बातें तो करते हैं पर इन पर अमल नहीं करते। उन नियमों या सिद्धांतों का मतलब ही क्या जिन पर पूरी ईमानदारी से अमल न हो। केवल बातों से तो कोई नतीजा नहीं निकल पाता। सच तो यह है कि हमने चारों ओर अहंकार की इतनी ऊंची-ऊंची दीवारें खड़ी कर ली हैं जिनके बाहर निकल कर यह देख नहीं सकते कि दुनिया कितनी तेजी से बदल रही है। तेरे मेरे के छोटे-छोटे खेलों से दुनिया या समाज नहीं बदला करते और तो और इनका परिवारों पर भी अच्छा असर नहीं होता।

होली असत्य पर सत्य की जीत का एक प्रतीक पर्व है। होलिका भौतिक सत्ता और दंभ के प्रतीक हिरण्यकशिपु की बहिन थी। अपने भाई के आदेश पर उसने सत्य के प्रतीक प्रह्लाद को अपनी गोद में बिठाकर आग में जला देना चाहा। उसे आग में न जलने का वरदान था। पर प्रहलाद की जगह होलिका स्वयं जल गई । प्रह्लाद अर्थात्‌ आत्मिक सत्ता सत्य का प्रतीक है। इसीलिए अगर संसार में सफल होना है तो सत्य का पहलू कभी मत छोड़ो। झूठ देखने में चाहे जितना ताकतवर लगे पर सत्य से ताकतवर कभी नहीं हो सकता। यह एक सच्चाई है जिससे हम मुंह नहीं मोड़ सकते।

होली सत्य और आनन्द का एक मिश्रित पर्व है। सत्य की डोर पकड़ कर ही हम वास्तविक आनन्द की अनुभूति प"ाप्त कर सकते हैं। यही होली का संदेश है। सच तो यह है कि मन में नफरतों का गुबार भर कर हम सत्य की डोर पकड़ना तो दूर उसके पास तक नहीं फटक सकते। झूठ के सहारे आत्मिक आनन्द की प्राप्ति संभव नहीं। सांसारिक वैभव हमें खानों में तो बांट सकता है पर सत्य के करीब नहीं आने दे सकता। इसलिए यह पर्व हमें जाति, धर्म, पदों, रुतबों और सांसारिक वैभवों के खानों में न केवल बंटने से रोकता है बल्कि मन के सारे गुबारों को निकाल कर पूरी उन्मुक्तता से अपने साथ जुड़ने का आह्वान भी करता है। देखना यही है कि हम कहां तक होली के इस शास्वत संदेश को अपने जीवन में उतार पाते हैं। यह एक पर्व ही नहीं अपितु प्रकृति का एक ऐसा विधान है जो हमारे सामने जीवन की वास्तविक सच्चाइयों को उजागर करता है। भारतीय संस्कृति में पर्वों का जो महत्व है, वह किसी अन्य संस्कृति में देखने को नहीं मिलता। होली के रंगों की तरह हम सबका जीवन खुशियों के रंग से हमेशा सराबोर रहे, यही मंगलकामना करता हूँ।

-वेद प्रकाश पाण्डेय, बेंगलूरू





परिचय

सात समंदर पार हिन्दी भाषा व साहित्य की सेवा के लिए समर्पित - नीलू गुप्ता

हरिद्वार के गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय से वेदालंकार और दि"ी विश्वविद्यालय से हिंदी में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त नीलू गुप्ता सात समंदर पार हिन्दी भाषा और साहित्य के यश की नित्य नयी इबारत लिख रही हैं।

दिल्ली के एक सामान्य परिवार में जन्मी नीलू जी सम्प्रति अमेरिका के डी एन्जा, कालेज, कुपरटीनो, कैलिफ़ोर्निया में अध्यापन के साथ-साथ हिन्दी साहित्य और व्याकरण संबंधी पुस्तकों के प्रणयन में सतत समर्पित हैं। देश और विदेश से प्रकाशित होने वाले हिन्दी की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में आपकी रचनाएँ एवं आलेख प्रायः प्रकाशित होते रहते हैं। आपने हिन्दी भाषा और साहित्य पर आधारित कई पुस्तकों का सृजन किया है। काव्य-संग"ह फूलों की डाली और कई भागों में प्रकाशित व्याकरण संबंधी पुस्तक सरल हिन्दी भाषा ने लेखिका को विशिष्ट पहचान और प्रतिष्ठा दिलाई है।

भारतीय मूल की डॉ. नीलू गुप्ता उत्तरी कैलिफोर्निया के फीमोन्ट शहर में "विश्व हिन्दी ज्योति' नामक संस्था के माध्यम से विदेशी धरती पर भारतीय संस्कृति तथा हिन्दी भाषा व साहित्य के प्रति लोगों में जनजागृति लाने के अभियान से जुड़ी हुई हैं। वह शिक्षण कार्य के साथ ही साथ हिन्दी के प्रचार-प्रसार के प्रति पूरी तरह से समर्पित हैं। "विश्व हिन्दी ज्योति' संस्था का मु"य ध्येय नई पीढ़ी को हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आगे लाना है, जिससे आने वाले समय में अपनी मातृभाषा की धरोहर को वे अपनी सन्तति को सौंप सकें।

विदेश में हिन्दी शिक्षण और सृजन की बात पर नीलू जी कहती हैं, विदेश में हिन्दी का अध्यापन करते हुए सदैव मेरा ध्यान सरल, सुगम और सहज ग"ाह्य बनाने की ओर रहता है। इससे लोगों में हिन्दी के प्रति रुझान बढ़ेगा और हिन्दी का दायरा व्यापक होगा।

कविता के प्रति आपका गहरा लगाव है। काव्य सृजन की कला में पारंगत नीलू जी की कविताओं में उनकी काव्य प्रतिभा की गहरी छाप दिखाई देती है।हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं में आप निरन्तर लिखती रहती हैं। उनकी कई कृतियॉं प्रकाशित हो चुकी हैं और हिन्दी साहित्य जगत में अपनी एक अलग पहचान बनाई है। पिछले दिनों नीलू जी की कविता "यहॉं और वहॉं' को विश्व हिन्दी सचिवालय मौरिशस द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय कविता प्रतियोगिता के अंतर्गत अमेरिका भौगोलिक क्षेत्र में द्वितीय पुरस्कार मिला है।

नीलू गुप्ता संप्रति संयुक्त राज्य अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया के फीमोन्ट शहर में निवास करती हैं। पाठक गण नीलू गुप्ता से उनके ई-मेल पळर्श्रीर्सीिींरऽूरहेे.लेा द्वारा संपर्क कर सकते हैं।

-वेद प्रकाश पाण्डेय, बेंगलूरू





चलते-चलते

कोई एहसास के आइने से,
अपना चेहरा छुपायेगा कब तक !
कृष्ण के देश में मेरे यारो ,
कंस खुशियॉं मनायेगा कब तक !!

- ज्ञानचंद "मर्मज्ञ'









Satya Prakash Nigam  | 
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इस मासिक समाचार पत्र के ऑनलाइन प्रकाशित होने की तिथि 12 मार्च 2014 है!




चित्र वीथी

 
 
 




Daily Snippets

01. आज का विचार

तैयारी करने में विफल रह कर, आप विफल होने के लिए ही तैयारी करते हैं..
    - बेंजामिन फ्रेंकलिन
02. As me Thinketh

Well...I am stilling thinking and haven't reached to any logical conclusion worth divulging at this moment....
03. हास्य और व्यंग्य

Truth is the most valuable thing we have. Let us economize it.

    - मार्क ट्वेन
04. दैनिक पहेली

If three hens lay three eggs in three days, how many eggs does a (statistical) hen lay in one day?