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कवि परिचय



ज्ञानचंद मर्मज्ञ
संपर्क सूत्र: No.13, 3rd Cross,K.R.Layout,
6th Phase, J.P.Nagar,
Bangalore-560078
  marmagya.g@gmail.com
  +91 98453 20295  
                

संक्षिप्त परिचय:

  • 26 अगस्त 1959 को बनारस की रसमयी धरती के पास स्थित एक छोटे से कस्बे सैद्पुर में जन्मे श्री ज्ञानचंद मर्मज्ञ समकालीन कविता के एक अमूल्य हस्ताक्षर के रूप में जाने जाते हैं!
  • जन्म से भारतीय,शिक्षा से अभियंता,रोजगार से उद्यमी और स्वभाव से कवि श्री ज्ञानचंद मर्मज्ञ अपेक्षाकृत कम हिन्दी भाषी क्षेत्र बंगलुरु में राष्ट्र-भाषा हिंदी के प्रचार प्रसार और विकास के साथ साथ स्थानीय भाषा के साथ समन्वय के लिए सतत प्रयत्नशील हैं !
  • लगभग तीन दशकों से पत्र-पत्रिकाओं की शोभा बढ़ा रहे ज्ञानचंद मर्मज्ञ जी की प्रथम काव्य-कृति "मिटटी की पलकें " का विमोचन तमिलनाडू के राज्य पाल महामहिम श्री सुरजीत सिंह बरनाला के कर कमलो द्वारा फरवरी -२००७ में हुआ जिसके उपरांत देश के लगभग 100 से भी अधिक संस्थाओं ने उन्हें अनेक सम्मानों से सम्मानित किया!
  • आप एक संवेदनशील कवि हैं आपकी कविताओं का प्रसारण "सलाम नमस्ते" रेडियो, न्यूयार्क, FM रेडियो,चेन्नई , आकाशवाणी वाराणसी, कोटा, पटियाला और बंगलुरु आदि केन्द्रों से अनेक बार होता रहा है ! E-TV एवं अशियानेट सुवर्णा चैनलों पर साक्षात्कार और दूरदर्शन बैंगलोर केंद्र पर आयोजित साहित्यिक चर्चाओं में आपकी सहभागिता रही है!
  • हिंदी के विकास एवं प्रचार प्रसार हेतु आयोजित अनेक राष्ट्रीय कार्यक्रमों में सहभागिता !
  • कन्या भ्रूण हत्या के विरुद्ध समाज में जागरूकता पैदा करने हेतु देश के विभिन्न मंचों से काव्य पाठ!
  • बंगुलुरु की अग्रणी साहित्यिक संस्था "अखिल भारतीय साहित्य साधक मंच" के संस्थापक अध्यक्ष व इसके द्वारा प्रकाशित मासिक पत्र के संपादक हैं !
  • राजभवन चेन्नई व देश के विभिन्न साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा आयोजित अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों एवं मुशायरों में सहभागिता!
  • लायंस क्लब सरक्की,बंगलोर के पूर्व अध्यक्ष! सामाजिक सेवा एवं मानव-उत्थान के अनेक कार्यक्रमों में हिस्सेदारी!



कविता (1)


    जग की जननी हे मां शारदे तुम ...

जग की जननी हे मां शारदे तुम मेरी पूजा को स्वीकार करना.
मुझको आता नहीं फूल चुनना, मुझको आता न श्रंगार करना.


कुछ न कुछ हर किसी को हुआ है, हर तरफ बेतहाशा धुआँ है.
मुश्किलों से भरी हैं ये राहें, इन अंधेरों को गुलज़ार करना.


जग की जननी हे मां शारदे तुम मेरी पूजा को स्वीकार करना.
मुझको आता नहीं फूल चुनना, मुझको आता न श्रंगार करना...


ओस की बूँद जब गुनगुनाए, गंध माटी से फूलों में आए.
रूप हो रंग हो भाव हो तुम, जग को खुशियों का संसार करना..


जग की जननी हे मां शारदे तुम मेरी पूजा को स्वीकार करना.
मुझको आता नहीं फूल चुनना, मुझको आता न श्रंगार करना...


प्यास पानी को ठगने लगी है, खून की प्यास लगने लगी है..
दिल से इन नफ़रतों को मिटा दे, सीख ले हर कोई प्यार करना.


जग की जननी हे मां शारदे तुम मेरी पूजा को स्वीकार करना.
मुझको आता नहीं फूल चुनना, मुझको आता न श्रंगार करना.


कब के सोए अभी तक ना जागे, कैसे समझेंगे तुझको अभागे.
साँस तेरी है आवाज़ तेरी, भूल बैठे हैं जयकार करना.


जग की जननी हे मां शारदे तुम मेरी पूजा को स्वीकार करना.
मुझको आता नहीं फूल चुनना, मुझको आता न श्रंगार करना.


भाव कितने तराशे पड़े हैं, कितने मर्मज्ञ प्यासे पड़े हैं.
इनको मालूम है यह पता है, तुझको आता न इंकार करना.


जग की जननी हे मां शारदे तुम मेरी पूजा को स्वीकार करना.
मुझको आता नहीं फूल चुनना, मुझको आता न श्रंगार करना.






कविता (2)


जो समाज औरत को देवी का दर्ज़ा देता है वही उस औरत को वेश्या बनने के लिए मजबूर करते समय देवी तो क्या माँ ,बहन, बेटी सभी को भूल जाता है ! किसी के कोमल सपनों को रौंद कर उसकी मजबूरियों को नंगा करने का यह अक्षम्य अपराध हमारे खूबसूरत समाज का एक ऐसा दाग़ है जो हर युग में चीख़ चीख़ कर इस बात की गवाही देता रहेगा कि मनुष्य सभ्यता का नक़ाब ओढ़े एक बेहद घिनौना प्राणी है ! कुछ ऐसे ही टूटे हुए बेजान सपनों की मजबूरियों से उपजी आँहों और सिसकियों की सौगात "वेश्या" लेकर आज आपके बीच उपस्थित हुआ हूँ ! यह एक प्रयास है उनके दुखों को बाँटने का और समाज के घिनौने चहरे से वह मुखौटा नोचकर फ़ेंकने का जिसे पहनकर यह समाज अच्छा होने का ढोंग रचता है ! इस प्रयास में मैं कितना सफल हुआ हूँ , यह तो आप ही बता सकते हैं !

    रात भर ही ये दूल्हा जियेगा ...


फूल की बेबसी की कहानी, फूल से फिर सजाई गयी है !
आदमी की वफ़ाओं की औरत, आज वेश्या बनाई गयी है !


जिन किताबों की हैं दास्तानें, उनके पन्नों पे कीलें गडी हैं !
जिन निगाहों में सपने उगे थे, उनमें मजबूरियों की लड़ी है !


जिस्म के भेड़ियों को पता है, तू महज एक दिन की है रानी!
रोज राजा बदलते रहेंगे, जब तलक है महल में रवानी !


कोई बाबुल नहीं कोई भाई, याद कैसे ज़माने को आई!
तू है नीलाम की चीज कोई,, फिर दरिंदों ने बोली लगाई!


हो गयी रात अब लाश को तुम, करके श्रृंगार दुल्हन बना लो!
कल जो चुम्बन दिया था किसी ने, अपने होठों से तुम पोंछ डालो !


कल जो आया था वो जा चुका है, भर गया जी तुम्हें खा चुका है !
आज नाज़ुक कली को मसलने,एक नया बागबाँ आ चुका है !


फ़ेंक दो दूर इन साड़ियों को , आँसुओं से बदन ढाँक डालो!
खोल दो स्तनों का जनाज़ा , चोलियों का कफ़न फूँक डालो !


तू अभागिन दुल्हन रात भर की , रात भर ही ये दूल्हा जियेगा !
रोयेगी बैठ कर फिर अकेली, लौट कर ना ये आँसू पियेगा !


रो रही है तू सदियों से यूँ ही,, जाने कब तक तू रोती रहेगी !
राक्षसों के कलेजे से लगकर,, लाश बनकर तू सोती रहेगी !



Satya Prakash Nigam  | 
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इस पृष्ठ के ऑनलाइन प्रकाशित होने की तिथि 22 फ़रवरी 2014 है!


चित्र वीथी

 
 
 




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